!! पंच आरती !!
इहिं विधि आरती राम की कीजै , आत्म अंतर वारणां लीजै ।
तन मन चन्दन प्रेम की माला , अनहद घंटा दीन दयाला ।
ज्ञान का दीपक पवन की बाती, देव निरंजन पाँचों पाती ।
आनन्द मंगल भाव की सेवा, मनसा मन्दिर आतम देवा ।
भक्ति निरनन्तर मैं बलिहारी, दादू न जाने सेवा तुम्हारी ।।
(2)
आरती जग जीवन तेरी , तेरे चरणकमल पर वारी फेरी ।
चित चांवर हेत हरि ढ़ारे , दीपक ज्ञान हरि ज्योति विचारे ।
घंटा शब्द अनाहद बाजै , आनन्द आरती गगन गाजे ।
धूप ध्यान हरि सेती कीजे , पुहप प्रीति हरि भांवरि लीजे ।
सेवा सार आत्मा पूजा , देव निरंजन और न दूजा ।
भाव भक्ति सौं आरती कीजै , इहि विधि दादू जुगै जुग जीजे ।।
(3)
अविचल आरती देव तुम्हारी , जुग जुग जीवन राम हमारी ।
मरण मीच यम काल न लागै , आवागवन सकल भ्रम भागे ।
योनि जीव जन्म नहिं आवै , निर्भय नाम अमर पद पावै ।
कल विष कुशल बंधन कांपै , पार पहुंचे थिरकर थापै ।
अनेक उद्धारे ते जन तारे , दादू आरती नरक निवारे । ।
निराकार तेरी आरती , बलि जाउं अनन्त भुवन के राइ |
सुर नर सब सेवा करे , ब्रह्मा विष्णु महेश ।
राम सत्यराम ।।।। दादूराम सत्यराम।। 36 ।। दादूराम सत्यराम ।।।। दादूराम स
राम सत्यराम ।।
।। दादूराम सत्यराम ।।
।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम स
देव तुम्हारा भेव न जाने, पार न पावे शेष चन्द्र सूर आरती करे, श्री नमो निरंजन देव । धरणि पवन आकाश आराधे, सबै तुम्हारी सेव। सकल भुवन सेवा करे, मुनिवर सिद्ध समाध । दीन लीन व्है रहे संत जन, अविगत के आराध । जै जै जीवन राम हमारी, भक्ति करे ल्यो लाय । निराकार की आरती कीजै, दादू बलि बलि जाय ।। (5)
तेरी आरती ए, जुग जुग जय जयकार । जुग जुग आतम राम, जुग जुग सेवा कीजिये। जुग जुग लंघे पार, जुग जुग जगपति को मिले। जुग जुग तारणहार, जुग जुग दर्शन देखिये । जुग जुग मंगलचारा, जुग जुग दादू गाइये। श्री प्राण उधारणहार ।।
श्री दादू जी के शिष्यों संतों द्वारा आरतियाँ ( 6 ) स्वामी श्री सुन्दरदास जी कृत
आरती परब्रह्म की कीजै, और ठौर मेरो मन न पतीजै ।
गगन मण्डल में आरती साजी, शब्द अनाहद झालर बाजी।
दीपक ज्ञान भये प्रकाशा, सेवक ठाडे स्वामी पासा ।
अति उछाह अति मंगला चारा, अति सुख विलसै बारंबारा । सुन्दर आरती सुन्दर देवा, 'सुन्दरदास' करे तहां सेवा ।।
राम सत्यराम ।।।। दादूराम सत्यराम ।। 37 ।। दादूराम सत्यराम ।।।। दादूराम स राम सत्यराम ।। ।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम स
(7)
आरती कैसे करूं गुसांई, तुमही व्यापि रहे सब ठांई । तुमही कुंभ नीर तुम देवा, तुमही कहिये अलख अभेवा। तुमही दीपक धूप अनूपा, तुम ही घंटा नाद स्वरूपा । तुम ही पाती पुहुप प्रकाशा, तुमही ठाकुर, तुम ही दासा । तुमही जलस्थल पावक पवनां, 'सुन्दर' पकरि रहै मुख मौना । ( 8 ) श्री बाबा बनवारीदास जी कृत ररंकार गुरु शब्द सुनाया, तांकी आरती कर मन भाया। आपा मेट गरीबी कीजै, गुरू आरती करे मरै न छीजै । ब्रह्मा विष्णु महादेव गाई, और दुनी सब धन्धै लाइ । धर्मराय डरतां आरती गावै, हरि का हुक्म न मेटया जावै । गुरू दादू चेला 'बनवारी' आरती करतां मिलै मुरारी ।।
(9)
गुरू गोविन्द की आरती गाऊं, सब सन्तन को माथा नाऊँ । । टेक ।।
देख देख दादू आरती गाई, ऐसी सांई सों ल्यौ लाई । परचै कबीर हरि गुण गाया, ताथें साहिब निकट बुलाया । नामा रैदास नाम सों राता, षट्-दर्शन के निकट न जाता । धन्ना सैन भक्ति-निधि कीन्ही, अन्तर्यामी लीला चीन्ही ।। पीपा सोंझा हरिदास गायो, औलख राम दरस दत पायो। गोरख भरथरि निज तत्त गहिया, हरि हरि करतां अविचल रहिया सकल साध मांगे दीदार, जुग जुग आरती करै कै बार । गुरू-दादू यह आज्ञा दीन्ही, 'बनवारी' हरि की आरती कीन्ही ।
दूराम सत्यराम ।।।। दादूराम सत्यराम।। 38 ।। दादूराम सत्यराम ।।।। दादूराम स राम सत्यराम ।। ।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम स
(10) बखना जी कृत
आरती रमता राम की कीजै, निराकार भज लाहा लीजै । आदि अन्त का सेवक बन्दा, ध्रुव प्रहलाद रू गोपीचन्दा ।। जन्म-जन्म का सेवक आदू, नामा कबीर जपै जन दादू । तूं ही तूं ही शिव ल्यौ लावे, शिव सनकादिक मुनिजन ध्यावे । राम भज रहे चरण निवासा, पीपा धन्ना सैन रैदासा । नूर तेज जहाँ ज्योति प्रकाशा, अनन्त साधु तहां बखनुदासा । ( 11 ) आचार्य स्वामी श्री चैनदास जी कृत आरती दादू दास तुम्हारी, तुम पुरवहु सतगुरु आस हमारी ।। प्राण पिण्ड न्यौछावर कीजै, प्रसन्न होय परम सुख दीजै । प्रफुल्लित प्राण मुदित गुण गाऊँ । दीन होय चरणों चित लाऊं । द्रवहु देव दयानिधि स्वामी, सकल शिरोमणि अन्तर्यामी । विनती येही करूं जनि दुरी, 'चैन' कहै मोहि राखो हजूरी ।। ( 12 ) श्री आचार्य स्वामी गरीबदास जी कृत गुरु दादू की कीजै, दर्शन देखि जुग जुग जीजै । तेज में तेरा वासा, झिलमिल चमकै ज्योति प्रकाशा । कहां लों आरती साधू गावै, दर्शन देखि परम सुख पावै । | प्रेम पियाला भर-भर दीजै, 'गरीबदास' अपनो कर लीजै ।। (13) प्रहलाददास जी कृत
आरती
नूर
आरती गुरु दादू की गाऊं, निशदिन हिरदा भीतर ध्याऊँ ।
चरण राउरी कमल सुरंगा, मकरन्द लेवे मो मन भृंगा । । १ ।। धनि तुम दरस तुम्हारे दासा, मैं गुन गाऊँ स्वासूं स्वासा ।।२।। नूर रूप तुम स्वामी मेरा, कहां लगि वरणो जस बहुतेरा ।। ३ ।। जन प्रहलाद शरण आयो तेरी, यह अरदास मानियो मेरी ॥ ४ ॥ ॥
दूराम सत्यराम ।।।। दादूराम सत्यराम ।। 39 ।। दादूराम सत्यराम ।।।। दादूराम स राम सत्यराम ।। ।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम सत्यराम।। ।। दादूराम स (14) मसकीनदास जी कृत
आरती गुरू दादू की कीजै, ब्रह्मरूप निज ध्यान धरीजै ।
प्रेम जल ले चन्दन चरचाऊँ, भाव भक्ति के पुहुप चढ़ाऊँ ।। १ ।
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तन मन थाली घृत संजोऊँ, नूर तेज के दीपक जोऊँ । । २ जगमग जोति भया उजियारा, भरम करम नाशत अंधियारा ।।३ ॥
जन मसकीन मिले गुरु राया, आरती करत परमपद पाया ।।४।।
(15) आरती टीलाजी महाराज कृत आरती करो हरि की मनां, सफल होय ज्यो थारा दिनां ।। १ ।।
सुरति सदा ले सन्मुख कीजै, ता सेती अमृत रस पीजै ।। २ ।। प्राण मगन हरि आगे नाचै, काल विकारल सबै ही नाचै || ३ || नख शिख सौंज सबै ही वारै, तबही देखत राम उधारै ।।४।। गुरू दादू यह मत सिखलावै, टीला के कहूँ और न आवै ।।५। ( दण्डवत प्रणाम करते समय बोलें) दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखन का चाव। तहाँ ले शीश नवाइये, जहाँ धरे थे पांव ।। बहै जात संसार में, सद्गुरू पकड़े केश । 'सुन्दर' काढ़े डूबतां, दे अद्भुत उपदेश ।।
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